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रविवार, 19 जुलाई 2015

ग़ज़ल

न जाने कहाँ है रौशनी, न जाने कहाँ भलाई है।
किसक़दर छाया है अँधेरा और फैली बुराई है।

जल गए पत्ते, सूख गए शजर, उजड़ा ठिकाना,
किसी बेरहम ने इस जंगल में आग लगाई है।

खुद का खुद से है मुक़ाबला है आज़माइश भी,
कभी खुद से है दोस्ती और कभी लड़ाई है।

यूँ ही नहीं तय कर रहा हूँ सफ़र मंज़िल का,
इस राह में हर क़दम पे हमने ठोकर खाई है।

हमें यक़ीन है रहम और क़ुर्बानी की बातों में,
तब ही तो मैंने इस परिंदे की जान बचाई है।

या तुझको बदल दूँगा या खुद को बदल दूँगा,
हमनें भी अपनी तक़दीर से शर्त लगाई है।

टूटी है हर कोशिश लेकिन अभी हारा नहीं हूँ,
'
तनहा' मुसीबतों से लड़ने की क़सम खाई है।

©-
मोहसिन 'तनहा'

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